Sarcouncil Journal of Humanities and Cultural Studies

Sarcouncil Journal of Humanities and Cultural Studies

An Open access peer reviewed international Journal
Publication Frequency- Bi-Monthly
Publisher Name-SARC Publisher

ISSN Online- 2945-3658
Country of origin-PHILIPPINES
Impact Factor- 3.6
Language- Multilingual

Keywords

Editors

गोदान में नारी सशक्तिकरण का चित्रण: एक आलोचनात्मक विश्लेषण

Keywords: गोदान, बहुआयामी उपस्थिति, नारी सशक्तिकरण.

Abstract: मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के सबसे प्रमुख यथार्थवादी लेखकों में से एक हैं, जिन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों के माध्यम से भारतीय समाज की जटिल सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से उजागर किया। उनका अंतिम और सबसे प्रभावशाली उपन्यास ‘गोदान’ (1936) ग्रामीण भारत की सामाजिक स्थिति का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करता है। गोदान प्रेमचंद का अंतिम और सबसे प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यास है, जो भारतीय ग्रामीण जीवन, किसान की पीड़ा, वर्ग संघर्ष और शोषण की जटिलता को अत्यंत यथार्थ के साथ प्रस्तुत करता है। इसका नायक होरी एक सीधा-साधा, ईमानदार लेकिन गरीब किसान है, जिसकी सबसे बड़ी आकांक्षा जीवन में एक गाय खरीदकर उसका दान करना है। गाय उसके लिए न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा की पहचान भी है। होरी अपने खेत, परिवार और सामाजिक मर्यादा को बचाने के लिए जीवनभर संघर्ष करता है। उसका बेटा गोबर, गाँव की विधवा लड़की झुनिया को भगा ले जाता है, जिससे होरी को सामाजिक अपमान और आर्थिक दंड सहना पड़ता है। फिर भी, वह अपनी "इज़्ज़त" और परंपरा के लिए सब कुछ सहन करता है। होरी की पत्नी धनिया एक मजबूत और व्यावहारिक महिला है, जो समय-समय पर सामाजिक रूढ़ियों का विरोध भी करती है। झुनिया, जो बाद में होरी के घर में बहू के रूप में रहती है, ग्रामीण स्त्री की पीड़ा और साहस का प्रतीक बनती है। कहानी में ग्रामीण समाज के साथ-साथ शहरी उच्च वर्ग के पात्र जैसे मालती, खन्ना, और डॉ. मेहता भी आते हैं, जो समाज के दोहरेपन, स्वार्थ और आधुनिकता के खोखलेपन को उजागर करते हैं। इस उपन्यास में न केवल आर्थिक शोषण और वर्ग संघर्ष का चित्रण किया गया है, बल्कि स्त्री पात्रों के माध्यम से नारी सशक्तिकरण के भी कई महत्वपूर्ण पहलू देखने को मिलते हैं। यह शोध-पत्र ‘गोदान’ में नारी पात्रों के विविध रूपों, उनके संघर्षों, सामाजिक दमन और उनके सशक्तिकरण के प्रयासों का गहन एवं आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। साथ ही, उपन्यास के विभिन्न पात्रों के माध्यम से प्रेमचंद द्वारा नारी जागरूकता और मुक्ति की संभावनाओं को भी समझने का प्रयास करता है।.

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